अभिषेक कपूर के निर्देशन में बनी 'केदारनाथ' दिसंबर 2018 में रिलीज हुई थी।

एक घंटा पहलेलेखक: मनीषा भल्ला

  • विश्व पर्यावरण दिवस पर खास रिपोर्ट, बॉलीवुड का रील और रियल पर्यावरण प्रेम
  • पर्यावरण संरक्षण पर बनी ‘इरादा’ नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली इकलौती बॉलीवुड फिल्म

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। सिनेमा अभिव्यक्ति के सबसे सशक्त माध्यमों में से एक है, पर बॉलीवुड पर्यावरण के प्रति अपने प्रेम की अभिव्यक्ति में ज्यादातर असफल ही रहा है भारत में पर्यावरण पर खतरों की कई कहानियां मिल सकती हैं, लेकिन बॉलीवुड के लिए यह कॉमर्शियल मुद्दा नहीं है।

अगर कोई ग्लोबल वार्मिंग पर बनी फिल्मों के बारे में सवाल करे तो हमें ‘द डे आफ्टर टुमारो’ जैसी हॉलीवुड की फिल्म ही याद आती है। विश्व की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री भारत में है, लेकिन यहां ग्लोबल अपील वाले विषय पर एक भी बड़ी फिल्म नहीं बनी है।

वैसे दिल्ली के एयर पॉल्यूशन या मुंबई में पेड़ों की कटाई के मुद्दे पर बॉलीवुड सेलेब्स तुरंत सोशल मीडिया की चौखट पर आ जाते हैं। जूही चावला जैसी स्टार एक कदम आगे बढ़कर 5G रेडिएशन के मुद्दे पर हाईकोर्ट में याचिका भी दायर कर देती हैं, लेकिन फाइनेंस या डिस्ट्रीब्यूशन का सवाल न होते हुए भी कोई बड़ा फिल्ममेकर इस मुद्दे को छूता तक नहीं है।

प्रयास हुए, लेकिन मेनस्ट्रीम में नहीं
देश में हिंदी के कुछ ही फिल्ममेकर्स हैं, जिन्होंने पर्यावरण पर फिल्म बनाई है। उन्होंने तारीफ भी पाई है और मुनाफा भी कमाया है, लेकिन ये मेकर्स मेनस्ट्रीम से नहीं हैं। बाकी फिल्में रीजनल भाषाओं में बनी हैं।

सोहा-सुशांत की ‘केदारनाथ’ ने गंवाया मौका
2018 में बनी ‘केदारनाथ’ सारा अली खान की डेब्यू फिल्म थी। सुशांत सिंह राजपूत हीरो थे। 2013 में उत्तराखंड में हुई ट्रेजडी इस फिल्म में दिखाई गई, लेकिन पर्यावरण का मुद्दा उठाने के बजाय यह फिल्म सिर्फ एक लव स्टोरी बन कर रह गई।

अभिषेक कपूर के निर्देशन में बनी 'केदारनाथ' दिसंबर 2018 में रिलीज हुई थी।

अभिषेक कपूर के निर्देशन में बनी ‘केदारनाथ’ दिसंबर 2018 में रिलीज हुई थी।

‘इरादा’ नेशनल अवॉर्ड पाने वाली इकलौती फिल्म
भारत के नेशनल अवॉर्ड्स में पर्यावरण संरक्षण पर बनी फिल्मों की कैटेगरी 1989 से है। सबसे पहले यह अवॉर्ड असम की ‘बोनानी’ फिल्म को मिला था, लेकिन 32 सालों में आज तक सिर्फ एक ही बार 2017 में हिंदी फिल्म ‘इरादा’ को यह अवॉर्ड मिला। इसके मुकाबले मलयामल की 6, कन्नड़ की 5 फिल्मों को यह अवॉर्ड मिला है। असमिया और उड़िया की 2-2, मणिपुरी, तमिल, मराठी और अरुणाचल की एक-एक फिल्म को यह अवॉर्ड मिला है।

अपर्णा सिंह के निर्देशन में बनी 'इरादा' बठिंडा, पंजाब के थर्मल पावर प्लांट्स और फैक्ट्रीज के चलते प्रभावित लोगों की सच्ची कहानियों पर बेस्ड है।

अपर्णा सिंह के निर्देशन में बनी ‘इरादा’ बठिंडा, पंजाब के थर्मल पावर प्लांट्स और फैक्ट्रीज के चलते प्रभावित लोगों की सच्ची कहानियों पर बेस्ड है।

सिनेमा सबसे असरदार माध्यम
ओडिशा के फिल्मकार नील माधव पांडा को ‘आई एम कलाम’ फिल्म से जाना जाता है। ‘कड़वी हवा’ और ‘कालीर अतीत’ भी उनकी ही फिल्में हैं। पांडा ने दैनिक भास्कर से बातचीत में बताया, ‘सिनेमा लोगों को बताने और समझाने का सबसे सशक्त माध्यम है। इसीलिए मैंने पर्यावरण की बात कहने के लिए इस माध्यम को चुना है।’

'कड़वी हवा' के एक सीन में संजय मिश्रा। इस फिल्म को कई अन्य भाषाओं में रूपांतरित किया जा रहा है।

‘कड़वी हवा’ के एक सीन में संजय मिश्रा। इस फिल्म को कई अन्य भाषाओं में रूपांतरित किया जा रहा है।

पांडा पर्यावरण के सब्जेक्ट से क्राइम को जोड़कर एक वेब सीरीज भी बना रहे हैं। दिल्ली पॉल्यूशन की वजह से एक कपल तलाक ले लेता है, ऐसी कहानी के साथ उन्होंने एक शॉर्ट फिल्म भी बनाई है।

‘भोपाल एक्सप्रेस’ के लिए 40 इन्वेस्टर जुटाए, मुनाफा भी मिला
महेश मिथई ने दैनिक भास्कर को बताया, ‘भोपाल एक्सप्रेस में सबसे बड़ा चैलेंज यह था कि फिल्म में दर्शकों का मनोरंजन चाहे न हो, लेकिन फिल्म में उनका इंटरेस्ट बना रहे। कोई बड़ा इन्वेस्टर नहीं मिला तो हमने छोटे-छोटे 40 इन्वेस्टर ढूंढे। भारत में रिलीज से लागत नहीं निकल सकी, लेकिन जब यह फिल्म जर्मनी और फ्रेंच टीवी चैनलों और सिनेमाघरों में रिलीज हुई और इंटरनेशनल फेस्टिवल्स में छा गई तो इससे लागत तो मिली ही, साथ ही मुनाफा भी हुआ।’

'भोपाल एक्सप्रेस' 1999 में रिलीज हुई थी। 1984 की गैस त्रासदी पर बेस्ड इस फिल्म में के के मेनन, नसीरुद्दीन शाह, नेत्रा रंगनाथन, जीनत अमान और विजय राज ने अहम भूमिका निभाई थी।

‘भोपाल एक्सप्रेस’ 1999 में रिलीज हुई थी। 1984 की गैस त्रासदी पर बेस्ड इस फिल्म में के के मेनन, नसीरुद्दीन शाह, नेत्रा रंगनाथन, जीनत अमान और विजय राज ने अहम भूमिका निभाई थी।

मिथई कहते है, ‘आज का यूथ पर्यावरण के प्रति और जागरूक है। अब ऐसी फिल्में ज्यादा देखी जाएंगी। अब फिल्म रिलीज के लिए प्लेटफॉर्म की कोई कमी नहीं। मैं भोपाल गैस त्रासदी पर ‘1984’ नाम से एक वेब सीरीज भी बना रहा हूं।’

प्लेटफॉर्म बढ़े हैं, घाटे का डर खत्म हुआ

फिल्ममेकर नील माधव पांडा।

फिल्ममेकर नील माधव पांडा।

नील माधव पांडा ने दैनिक भास्कर को बताया, ‘पर्यावरण पर बनी मेरी हर फिल्म ने हमेशा अपना खर्चा निकाला। अब तो प्लेटफॉर्म बढ़ गए हैं, इसलिए देखने वालों की कोई कमी है ही नहीं।’

फिल्ममेकर महेश मिथई।

फिल्ममेकर महेश मिथई।

महेश मिथई कहते है, ‘इन मुद्दों पर बड़े प्रोड्यूसर का संकोच समझ नहीं आता। ऐसी फिल्मों को दर्शक नहीं मिलेंगे, यह कहना गलत होगा। ओटीटी ने टेस्ट बदल दिया है।’

तमिल फिल्म क्रिटिक एन रमेश बाला ने दैनिक भास्कर को बताया, ‘तमिल इंडस्ट्री में पर्यावरण पर बनी ‘भूमि’, ‘कत्थी’, ‘उरयादी-2’, ‘काप्पान’ जैसी फिल्में कॉमर्शियली सफल रही हैं। सवाल मुद्दों का नहीं, शर्त यह है कि फिल्म अच्छी बनी हो।’

बॉलीवुड लव, सेक्स, धोखा, क्राइम, वॉयलेंस में फंसा रहता है
पर्यावरण एक्टिविस्ट सुनीता नारायण मेनस्ट्रीम सिनेमा पर बिफर पड़ीं। उन्होंने हमसे बातचीत में कहा, ‘सेलिब्रिटीज को कुछ पढ़ना-लिखना चाहिए। उन्हें पता होना चाहिए कि देश में क्या चल रहा है और उसके नतीजे क्या होने वाले हैं।’

सेव आरे कैंपेन के दौरान फिल्म एक्ट्रेस श्रद्धा कपूर।

सेव आरे कैंपेन के दौरान फिल्म एक्ट्रेस श्रद्धा कपूर।

मुंबई में दो साल पहले आरे में मेट्रो प्रोजेक्ट के लिए पेड़ काटने के खिलाफ आंदोलन हुआ था। उससे जुड़े एक्टिविस्ट संजीव वालसन ने बताया, ‘आरे से पास में ही फिल्म सिटी है। इसलिए यह जंगल का मुद्दा सेलेब्स के ध्यान में भी आया। श्रद्धा कपूर, जॉन अब्राहम, जावेद अख्तर, आमिर खान और रवीना टंडन समेत कई सेलिब्रिटीज ने हमारा साथ दिया था। लेकिन यह भी सच है कि वे जिस माध्यम से आते हैं, उस सिनेमा में पर्यावरण को लेकर कोई बड़ी फिल्म नहीं बनी है।’

संजीव आगे कहते हैं, ‘भारतीय कहानी पर बनी ‘अवतार’ पूरी दुनिया में चली थी। सारी दुनिया में पर्यावरण के मुद्दे पर फिल्में बनती हैं, लेकिन हमारे यहां का कॉमर्शियल सिनेमा लव, सेक्स, वॉयलेंस और धोखे में फंसा है।’

पर्यावरणविद और लेखक नितिन सेठी ने बताया, ‘गढ़वाल, मणिपुर, ओडिशा और तमिल में पर्यावरण पर बेहतरीन कॉमर्शियल फिल्में बनी हैं। उन्होंने स्क्रिप्ट में मेरी मदद भी ली है। बॉलीवुड के स्क्रिप्ट राइटर इस जमीनी हकीकत से दूर हैं। प्रोड्यूसर भी रिस्क नहीं लेना चाहते, लेकिन अच्छा है कि इस कमी को रीजनल सिनेमा पूरा कर रहा है।’

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