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नई दिल्ली. पंजाब कांग्रेस में नवजोत सिंह सिद्धू (Navjot Singh Sidhu) और सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह (Captain Amarinder Singh) के बीच चल रही तनातनी खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. कांग्रेस आलाकमान दोनों के बीच विवाद खत्म करने का जो फॉर्मूला तैयार करती है, उसको किसी न किसी एक गुट की तरफ से मानने से इनकार कर दिया जाता है. शुक्रवार को भी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने आवास पर राहुल गांधी, हरीश रावत और सिद्धू के साथ बैठक की. माना जा रहा है कि इस बैठक में भी कोई नतीजा नहीं निकल सका. पार्टी की आंतरिक कलह को खत्म करने में प्रियंका गांधी भी मध्यस्थ की भूमिका निभा रही हैं. पिछले सप्ताह ही उन्होंने ही राहुल गांधी और सिद्धू के बीच बैठक कराई थी. ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच बात क्यों नहीं बन रही है? क्यों पंजाब की राजनीति में अब सिद्धू की लड़ाई सिद्धू से ही हो रही है? आखिर पटियाला के रहने वाले दो कांग्रेसी नेताओं की लड़ाई का अंजाम क्या होगा?

पंजाब कांग्रेस में दो सिद्धू की हैसियत की लड़ाई
बीते चार दिनों से मीडिया में इस बात की चर्चा थी कि शुक्रवार को नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष घोषित कर दिया जाएगा. शुक्रवार को सिद्धू को दिल्ली बुलाया भी गया, लेकिन आधे घंटे में ही सोनिया गांधी के साथ मीटिंग खत्म हो गई. मीटिंग के बाद हरीश रावत से पत्रकारों ने सिद्धू को अध्यक्ष पद देने को लेकर सवाल किया तो रावत ने कहा किसने आपको बताया है कि सिद्धू पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष बनने जा रहे हैं. रावत का यह जवाब देना कई सवालों को जन्म दे रहा है. फिलहाल, पंजाब कांग्रेस की कमान सिंह के करीबी सुनील जाखड़ के पास ही है.

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पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू की छवि एक ईमानदार नेता की है. (फाइल फोटो)

कांग्रेस आलाकमान के लिए असमंजस की स्थिति
पंजाब की राजनीति को नजदीक से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार संजीव पांडेय कहते हैं, ‘पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू की छवि एक ईमानदार नेता की है. दूसरी जो छवि सिद्धू की है वह यह कि वह बादल परिवार के प्रति शुरू से ही हमलावर रहे हैं. पंजाब की जनता खासकर गांव में रहने वाले और किसानों को लगता है कि सिद्धू आएंगे तो गुरुग्रंथ साहिब के अपमान और बादल परिवार पर जो भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं उस पर फैसला लेंगे. किसानों में भी सिद्धू को लेकर एक अच्छी इमेज है. एक बात यह भी है कि सीएम बनने के बाद अमरिंदर सिंह ने जो 2002 में काम किया था वह 2017 में सत्ता में आने के बाद नहीं किया. लैंड माफिया, माइनिंग माफिया, शराब माफिया और ड्रग माफिया पर भी पंजाब की मौजूदा सरकार ने कार्रवाई नहीं की है. अमरिंदर सिंह पर बादल परिवार के साथ सांठ-गांठ के आरोप लगते रहे हैं. सिद्धू ने अमरिंदर सिंह सरकार और बादल के 10 सालों के कार्यकाल पर भी इन माफियाओं को आश्रय देने का आरोप लगाते रहे हैं. गुरुग्रंथ साहिब के अपमान को लेकर भी अमरिंदर सरकार का जो स्टैंड रहा है, उसको लेकर आम सिख समुदाय में रोष है.’

सिद्धू की लोकप्रियता अमरिंदर सिंह पर क्यों है भारी?
पांडेय आगे कहते हैं, ‘कांग्रेस आलाकमान को पता चल चुका है कि अमरिंदर सिंह उनको दोबारा से सत्ता में नहीं ला सकते हैं. अमरिंदर सिंह गांधी परिवार के नजदीकी रहे हैं, इसलिए कांग्रेसी नेता बीच का रास्ता निकालने में लगे हैं. सिद्धू का कैप्टन मंत्रिमंडल से इस्तीफा के बाद से ही कांग्रेस आलाकमान ने मन बना रखा था कि चुनाव से छह महीने पहले सिद्धू को संगठन में अहम जिम्मेदारी दी जाएगी. दूसरी बात यह है कि नवजोत सिंह सिद्धू भी उसी जगह से हैं, जहां से अमरिंदर सिंह आते हैं. दोनों पटियाला के रहने वाले हैं. अमरिंदर सिंह जिस सिद्धू क्लेन (गोत्र) से हैं, उसी सिद्धू क्लेन से नवजोत भी आते हैं. कांग्रेस को पहले लग रहा था कि किसान आंदोलन की वजह से आराम से सत्ता में वापसी कर जाएंगे, लेकिन आम आदमी पार्टी का जिस तरह से एक बार फिर से पंजाब में उदय हुआ है उससे कांग्रेस के लिए स्थिति अब आसान नहीं रहने वाली है. ऐसे में नवजोत सिंह सिद्धू को कांग्रेस चाह कर भी दनकिनार नहीं कर सकती और अमरिंदर से पाला नहीं छुड़ा सकती. अगर नवजोत सिंह सिद्धू आम आदमी पार्टी की तरफ रुख करते हैं तो आम आदमी पार्टी का सत्ता में आना तय माना जा रहा है.’

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राहुल, प्रियंका और नवजोत सिंह सिद्धू के मुलाकात की फाइल फोटो

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किसान आंदोलन ने पंजाब कांग्रेस की पॉलिटिक्स कैसे बदली?
कुल मिलाकर पंजाब की राजनीति अगले कुछ दिनों में कौन सी करवट लेगी यह कहना अभी जल्दबाजी होगा. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नवजोत सिंह सिद्धू जिस तरफ रहेंगे सत्ता उधर रहेगी. हालांकि, पंजाब की राजनीति जो किसान आंदोलन से पहले थी, वह अब किसान आंदलोन के बाद साफ बदल गई है. पंजाब की राजनीति में किसान महत्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रहे हैं. किसानों को भी सलाह दी जा रही है कि वह अपना पॉलिटिकल फ्रंट बना कर चुनाव लड़ें. किसान संगठनों ने अगर राजनीतिक फ्रंट बना लिया तो पंजाब के किसान और ग्रामीण इलाकों के बड़े वोट बैंक पर उनका कब्जा हो जाएगा.

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