नई दिल्ली. भारत और चीन के बीच लद्दाख में पिछले एक साल से चल रहा गतिरोध अभी भी जारी है. तनाव भले ही कम हो, लेकिन चीन को पिछले एक साल के भीतर भारत की ताक़त का अहसास जरूर हो गया है. लिहाजा उसने एलएसी पर तैनात सैनिकों को नए हथियारों से लैस कर दिया है. पिछले साल गर्मियों में पूर्वी लद्दाख में जो विवाद शुरू हुआ वो अभी भी जारी है. जो चीनी सैनिक सर्दियों के मौसम में पेट्रोलिंग तो छोड़ो अपने बंकरों से बाहर तक नहीं निकलते थे, वो पूरी सर्दी भर एलएसी पर बैठे रहे. इस एक साल में चीन ने भारतीय सेना की ताक़त से सीख लेते हुए उसका तोड़ भी निकालना शुरू कर दिया है.

सूत्रों के मुताबिक़ भारतीय सेना की आर्टिलरी में शामिल मल्टी बैरल राकेट लॉन्चर BM-21 ग्रेड एलएसी पर तैनात है. लिहाजा चीन ने भी पूर्वी लद्दाख में मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर PHL-11 122 mm तैनात किए हैं. यह एक बार में 40 रॉकेट दाग सकता है. हाल ही में इसका अभ्यास चीन ने तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में किया है. इस लॉन्चर में 122 mm के रॉकेट लगे हैं. ये एक सेल्फ प्रोपेल्ड राकेट लॉन्चर है. इसे चीनी सेना की बैकबोन के तौर पर देखा जाता है.

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यही नहीं, चीन ने तो पूर्वी लद्दाख में अब तक इस्तेमाल में लाए जा रहे आर्मर्ड टाइप 63 ऑर्मर्ड पर्सन कैरियर को नए ZBL-09 जिसे स्नो लेपर्ड के नाम से भी जाना जाता है, उसे बदलने जा रहा है. इस बखतरबंद गाड़ी में 3 क्रू और 7 से 10 सैनिकों के बैठने की जगह है. इस गाड़ी में पीछे दरवाजा है और अगर इमर्जेंसी में इससे निकलना हो, तो इस गाड़ी के ऊपर से निकला जा सकता है. इस व्हीकल में अंदर बैठे सैनिकों के लिए फायरिंग पिट भी है, जहां से गोलियां भी दाग़ी जा सकती हैं. इस व्हीकल की मुख्य गन 30 mm की है, तो एक 7.62 mm की मशीन गन भी लगी हुई है. इस कॉम्बेट व्हीकल में 2 एंटी टैंक गाइडेड मिसाइलें भी लगी हैं.

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वहीं लद्दाख के इलाकों में अपने साजो-सामान और रसद को हर मौसम में दुर्गम स्थानों तक ले जाने के लिए चीनी सेना ने एक खास ऑल टेरेन व्हीकल को शामिल किया है जो कि लंबी दूरी के लॉजिस्टिक सपोर्ट मिशन के लिए पूरी तरह से फ़िट है. ये 5 हज़ार मीटर यानी कि 16000 फुट की ऊंचाई पर आसानी से काम कर सकती है. इसे खास तौर पर प्लाटू के लिए तैयार किया गया है और ये एक बार में 1.5 टन सामान ले जा सकता है. इस व्हीकल को 35 डिग्री एंगल वाली ऊंचाई में भी आसानी से चढ़ाया जा सकता है.

चीन पिछले कुछ समय से हाई ऑल्टिट्यूड इलाकों में अपने हेलीकॉप्टर ऑपरेशन पर भी ख़ासा ध्यान दे रहा है जिसके लिए उसने खुद z-10 अटैक हेलीकॉप्टर और Z-20 टैक्टिकल यूटिलिटी हेलीकॉप्टर बनाया है और तिब्बत में इसकी तैनाती की गई है. हाल ही में रात के ऑपरेशन के लिए z-20 का एक अभ्यास भी चीन कर चुकी है, लेकिन ये ऊंचे इलाकों में इतने कारगर साबित नहीं हुए, तो चीन ने रूस से MI हेलीकॉप्टर के 3 वेरियंट ख़रीदे हैं. कुल 500 MI हेलीकॉप्टर में MI-171E, MI-171SH, MI-171LT है जिनमें से 140 की डिलीवरी हो चुकी है.

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भारतीय सेना के टैंकों से मुक़ाबला करने के लिए चीन ने लाइट टैंक को भी बड़ी संख्या में तिब्बत में तैनात किया है. ये टाइप 15 लाइट टैंक को प्लाटू इलाके में रैपिड कॉम्बेट के लिए तैयार किया गया है, लेकिन ये भारतीय टैंक टी-90 और टी-72 का मुक़ाबला नही कर सकती. इसकी रेंज 3 किलोमीटर के क़रीब है और वज़न में हल्की होने के चलते ये तिब्बत के इलाके में आसानी से मूव कर सकते हैं. पिछले सालों में चीन ने PCL 181 ट्रक माउंटेड 155 एमएम सेल्फ प्रोपेल्ड हॉवित्सर की तैनाती भी की है. 2019 में इसे चीनी सेना में शामिल किया गया था. चीन का दावा है कि उस तोप से 40 किलोमीटर तक गोले दाग सकता है. इस गन के ज़रिये अभी तक इस्तेमाल में लाए जा रहे 152 mm की टोड गन हॉवित्सर और 130 mm टाइप 59-1 टोड फील्ड गन को बदला जा रहा है.

यही नहीं, तिब्बत मिलेट्री कमांड में तीसरी पीढ़ी के असॉल्ट व्हीकल डोंगफेंग मेंग्शी को भी तैनात किया गया है. ये एक ऑफरोड टैक्टिकल ऑर्मड व्हीकल है जिन्हें पीएलए बॉर्डर डिफेंस ट्रूप इस्तेमाल कर रही है. हाल ही में शिंजियान मिलेट्री रीजन में भी इन असॉल्ट व्हीकल की डिलीवरी की गई है. एलएसी के पास चीन की एंटी एयरक्राफ़्ट रेजीमेंट HQ-17 जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल से लैस है जो कि 12 किलोमीटर दूरी से किसी भी एरियल टार्गेट को निशाना बना सकती है. चीन ने तो अपनी हवाई ताक़त में इज़ाफ़ा करने के लिए 300 से 350 पुराने पड़े फ़ाइटर j7 की पूरी फ्लीट को चौथी और पांचवीं पीढ़ी के J-16 और J-20 से बदल रहा है जो कि तिब्बत ऑटोनोमस रीजन में तैनात है. बहरहाल चीन भले ही कितनी भी कोशिश कर ले, लेकिन भारतीय सेना के सामने इतने ऊंचे इलाके में लड़ पाना उसके लिए आसान नहीं होगा.

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