326 cases of sedition were registered in India Between 2014-19

भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए के तहत राजद्रोह के अपराध की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका दायर हुई है. ये ऐसी पांचवीं याचिका है. याचिका में कहा गया है कि इस कानून का इस्तेमाल पत्रकारों को डराने, चुप करने और दंडित करने के लिए लगातार हो रहा है. ये कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की आजादी में बाधक बन रहा है.

ये याचिका दो महिला पत्रकारों पेट्रीसिया मुखिम और अनुराधा भसीन द्वारा दायर की गई है. याचिका में इस प्रावधान को आईपीसी से हटाने की बात की गई है. याचिका में कहा गया है कि 1970 से 2021 तक नागरिकों के मौलिक अधिकारों के न्यायशास्त्र के विकास को देखते हुए, संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के उल्लंघन के रूप में लागू प्रावधान को रद्द किया जा सकता है.

इस संबंध में याचिका में एनसीआरबी डेटा का संदर्भ भी दिया गया है, जिसके अनुसार, 2016 से 2019 तक 160% की वृद्धि के साथ राजद्रोह के मामलों में भारी वृद्धि हुई है. हालांकि अदालतों द्वारा इसकी सजा दर बहुत कम केवल 3.3 फीसदी ही है.

याचिका में कहा गया है, “राजद्रोह के अपराध के लिए सजा का तीन स्तरीय वर्गीकरण, आजीवन कारावास से लेकर जुर्माने तक, बिना किसी विधायी मार्गदर्शन के, न्यायाधीशों को बेलगाम विवेक प्रदान करने के बराबर है, जो मनमानी के सिद्धांत से प्रभावित है और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है.”

इसके अलावा तर्क दिया गया है कि स्वतंत्र भाषण पर प्रतिबंध के रूप में राजद्रोह संवैधानिकता आवश्यकता और आनुपातिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता. ये भी कहा गया कि घृणा, अप्रसन्नता, निष्ठाहीन आदि जैसे शब्द सटीक मुद्दे के निर्माण में असमर्थ हैं. ये अस्पष्टता और अतिव्याप्ति के सिद्धांत से प्रभावित हैं, जिससे संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होता है.

क्यों उठ रहे सवाल

राजद्रोह कानून को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं. हाल के बरसों में मनमाने तरीके से लोगों के लिखने, बोलने और सोशल मीडिया पर पोस्ट करने पर राजद्रोह जैसी धारा लगाई जा रही है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट इस पर चिंता जाहिर कर चुका है. लेकिन इसके बाद भी ये जारी है. जानते हैं कि आखिर क्या है राजद्रोह कानून, जो आजकल तमाम मामलों और घटनाओं के बाद खासा चर्चा में है.

क्या है राजद्रोह का क़ानून?

भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए के अनुसार, जब कोई व्यक्ति बोले गए या लिखित शब्दों, संकेतों या दृश्य प्रतिनिधित्व द्वारा या किसी और तरह से घृणा या अवमानना या उत्तेजित करने का प्रयास करता है या भारत में क़ानून द्वारा स्थापित सरकार के प्रति असंतोष को भड़काने का प्रयास करता है तो वह राजद्रोह का आरोपी है.

326 cases of sedition were registered in India Between 2014-19

भारत में 2014-19 के बीच राजद्रोह के 326 मामले दर्ज हुए. लेकिन ज्यादातर मामलों में ये या तो अदालत तक पहुंचे ही नहीं या फिर अदालत से ज्यादातर लोग बरी हो गए.

कितनी सजा है

राजद्रोह एक ग़ैर-जमानती अपराध है. इसमें सज़ा तीन साल से लेकर आजीवन कारावास और जुर्माना है.

कितनों को सजा हुई और कितने बरी

नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, भारत में साल 2015 में 30, 2016 में 35, 2017 में 51, 2018 में 70 और 2019 में 93 राजद्रोह के मामले दर्ज हुए. 2019 में देश में जो 93 राजद्रोह के मामले दर्ज हुए. 96 लोगों को गिरफ़्तार किया गया. इन 96 लोगों में से 76 आरोपियों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर की गई. 29 को बरी कर दिया गया. इन सभी आरोपियों में केवल दो को अदालत ने दोषी ठहराया.

2018 में जिन 56 लोगों को राजद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किया गया. उनमें 46 के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर हुई. उनमें से केवल 2 लोगों को ही अदालत ने दोषी माना. इसी तरह 2017 में जिन 228 लोगों को राजद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किया गया उनमें से 160 के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर हुई और उनमे से भी मात्र 4 लोगों को ही अदालत ने दोषी माना.

2016 में 48 लोगों को राजद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किया गया. उनमें से 26 के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर हुई. केवल 01 आरोपी को ही अदालत ने दोषी माना. वहीं 2015 में इस क़ानून के तहत 73 गिरफ़्तारियां हुईं. 13 के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर हुई. इनमें से एक को भी अदालत में दोषी नहीं साबित किया जा सका.

इसी तरह 2014 में 58 लोगों को राजद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किया गया. केवल 16 के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर हुई. उनमें से केवल 1 को ही अदालत ने दोषी माना.

Gurudev Rabindra Nath Tagore, Rabindra Nath Tagore, Bengal, West Bengal, 7 May, Nobel Prize in literature,

महात्मा गांधी और कई नेताओं को राजद्रोह कानून के तहत अंग्रेज सरकार ने सजा दी. दरअसल वो ये कानून भारतीयों का दमन करने के लिए लाई थी, ये कानून एक तरह से भारतीयों का अपमान है लेकिन ये अब तक भारत में लागू है.  (तस्वीर: Wikimedia Commons)

क्या इस कानून को खत्म कर देना चाहिए

पिछले कुछ सालों से इस बात पर बहस चल रही है कि क्या देशद्रोह कानून को खत्म कर देना चाहिए. जुलाई 2019 में राज्य सभा में एक प्रश्न के जवाब में गृह मंत्रालय ने कहा, “देशद्रोह के अपराध से निपटने वाले आईपीसी के तहत प्रावधान को ख़त्म करने का कोई प्रस्ताव नहीं है”. सरकार ने कहा, “राष्ट्रविरोधी, अलगाववादी और आतंकवादी तत्वों का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने के लिए प्रावधान को बनाए रखने की जरूरत है.”

हालांकि कानून के जानकार साफ कहते हैं कि ऐसी धारा होनी ही नहीं चाहिए. इस क़ानून का क़ानून की किताब में होना ही इसके दुरुपयोग को जन्म देता है. ब्रिटिश राज में बनाये गए इस कानून की मंशा तब भारतीय आजादी की लड़ाई लड़ रहे लोगों को किसी भी तरह कुचलने की थी. उसमें ये कानून उनके लिए मददगार था. ऐसे कानून को अब दुनियाभर से खत्म किया जा रहा है.

क्या ये क़ानून अस्पष्ट है

ज्यादातर कानूनविद और वकील कहते हैं, अगर आपराधिक क़ानून की कोई धारा अस्पष्ट है तो लोगों को उस धारा के अधीन नहीं किया जा सकता जो उन्हें आजीवन जेल में डाल सकती है. नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के आंकड़े साफ़ दिखाते हैं कि राजद्रोह के अधिकतर मामलों में दोषी माना जाना तो दूर चार्जशीट तक नहीं दायर हो पाती. ये कानून वास्तव प्रजा को दबाने की कोशिश वाला कानून ज्यादा बन गया लगता है.

महात्मा गांधी को मिली थी इसके तहत सजा

महात्मा गांधी इस कानून की सजा पाने वालों में एक थे. कई और क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों को इससे दंडित किया गया. निश्चित तौर पर ऐसे कानून का लागू रहना अपमान ज्यादा है.

विधि आयोग का परामर्श पत्र क्या था

भारतीय विधि आयोग या लॉ कमीशन ने 2018 में राजद्रोह के ऊपर एक परामर्श पत्र जारी किया. राजद्रोह के कानून को लेकर आगे क्या रास्ता निर्धारित किया जाना चाहिए इस पर लॉ कमीशन ने कहा कि “लोकतंत्र में एक ही गीत की किताब से गाना देशभक्ति का पैमाना नहीं है” और “लोगों को अपने तरीके से अपने देश के प्रति अपना स्नेह दिखाने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए” और ऐसा करने के लिए “सरकार की नीति में ख़ामियों की ओर इशारा करते हुए कोई रचनात्मक आलोचना या बहस” की जा सकती है.

लॉ कमीशन ने कहा कि “इस तरह के विचारों में प्रयुक्त अभिव्यक्ति कुछ के लिए कठोर और अप्रिय हो सकती है” लेकिन ऐसी बातों को राजद्रोह नहीं कहा जा सकता है. लॉ कमीशन ने यह भी कहा, “धारा 124ए केवल उन मामलों में लागू की जानी चाहिए जहां किसी भी कार्य के पीछे की मंशा सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने या हिंसा और अवैध साधनों से सरकार को उखाड़ फेंकने की है.”

इस परामर्श पत्र में लॉ कमीशन ने कहा, “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के हर ग़ैर-ज़िम्मेदाराना प्रयोग को राजद्रोह नहीं कहा जा सकता है.” साथ ही यह भी कहा कि तत्कालीन सरकार की नीतियों से मेल न खाने वाले विचार व्यक्त करने के लिए किसी व्यक्ति पर राजद्रोह की धारा के तहत आरोप नहीं लगाया जाना चाहिए.

ब्रिटेन और उपनिवेशों में खत्म हो चुका है ये कानून

यूनाइटेड किंगडम ने दस साल पहले देशद्रोह क़ानूनों को समाप्त कर दिया था. साथ ही ब्रिटेन के तहत रहे उपनिवेशों, जो अब आजाद हो चुके हैं, वहां भी ये कानून खत्म किए जा चुके हैं.

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